Thursday, October 31, 2019

गुलाबी गेंद से देश में पहला टेस्ट, क्या रंग दिखाती है यह बॉल

अरानी बसु, नई दिल्ली बीसीसीआई के नए बॉस सौरभ गांगुली डे-नाइट टेस्ट मैच की वकालत करते रहे हैं और अब 22 नवंबर से कोलकाता के ईडन गार्डन मैदान पर देश में पहला डे-नाइट टेस्ट मैच खेला जाएगा। भारत और बांग्लादेश के बीच खेले जाने वाले इस मैच में एक महीने से भी कम का वक्त बचा है। ऐसे में चर्चा में है क्योंकि इस गेंद से भारत में पहला टेस्ट मैच खेला जाएगा। सबसे बड़ा सवाल है कि आखिर यह गेंद कैसे बर्ताव करेगी। बीसीसीआई ने एसजी कंपनी को भारत और बांग्लादेश मैच के लिए 72 गुलाबी गेंदें बनाने का ऑर्डर दे दिया है। यही कंपनी भारत में होने वाले घरेलू और टेस्ट मैचों के लिए गेंद बनाती है। हमारे सहयोगी अखबार टाइम्स ऑफ इंडिया को पता चला है कि भारतीय टीम प्रबंधन ने ऐसी गेंद बनाने को कहा है जो भारत में लाल गेंद की तरह ही व्यवहार करें। एसजी की ओर से भी इसकी पुष्टि हो गई है। एसजी के निदेशक पारस आनंद ने बताया, 'हमने खिलाड़ियों से फीडबैक लिए हैं। हमारी सोच यही है कि गुलाबी गेंद को जितना हो सके लाल गेंद जैसा ही बनाएं।' बीसीसीआई चीफ सौरभ गांगुली ने कहा है कि कोलकाता में होने वाले डे-नाइट टेस्ट में बीसीसीआई ड्यूक्स या कूकाबूरा की जगह एसजी टेस्ट गुलाबी गेंद का ही इस्तेमाल करेगा। रिवर्स स्विंग को बनाए रखना बड़ी चुनौती गुलाबी गेंद के साथ सबसे बड़ी समस्या रंग और आकार को लेकर है। इसमें रिवर्स स्विंग को बनाए रखना एक बड़ी चुनौती भी है। भारतीय उपमहाद्वीप में खेले जाने वाले मुकाबलों में रिवर्स स्विंग खेल का एक अहम हिस्सा है। आनंद ने कहा, 'लाल गेंद गहरे रंग की होती है, इससे खिलाड़ियों को गेंद को चमकाने में आसानी होती है ताकि वह सारा दिन गेंद को स्विंग करा सकें। गुलाबी गेंद की शुरुआत ही चटक रंग से होती है। इसमें संतुलन साधने पर हम काम कर रहे हैं।' इसके साथ ही गेंद की सीम भी काफी महत्वपूर्ण होती है। आनंद ने बताया कि इस गेंद की सीम परंपरागत तौर की होगी। लाल गेंद में जब लैकर (लाह) हट जाता है तो टीमें आम तौर पर एक हिस्से को चमकाती रहती हैं और दूसरे हिस्से को रफ होने दिया जाता है। गुलाबी रंग ही क्यों नारंगी और पीले को आजमाने के बाद आखिर गुलाबी रंग पर सहमति बनी। पुराने रंगों को टीवी कैमरा पकड़ नहीं पाते थे और यह आंखों को भी चुभता था। सीम शुरुआत में बाहरी सिलाई हरे रंग की थी। लेकिन खिलाड़ियों के फीडबैक के बाद इसे काला किया गया। गुलाबी गेंद कैसे बनाई जाती है
  • मैटेरियल- इसे बनाने का तरीका लाल गेंद जैसा ही है। इसमें कॉर्क, रबड़ और ऊन लगता है। हालांकि मुख्य अंतर यह है कि लाल गेंद को ग्रीस में डुबाया जाता है ताकि उसमें पानी न जा सके वहीं गुलाबी गेंद को ग्रीस में डुबाने का उद्देश्य उसकी दृश्यता बढ़ाना होता है।
  • कैसे करती है व्यवहार- शुरुआती 10-15 ओवरों में ज्यादा स्विंग होती है। एक बार सॉफ्ट होने के बाद हालांकि बल्लेबाजों के लिए काफी मददगार हो जाती है। रिवर्स स्विंग होना लगभग नामुमकिन और स्पिनर्स को भी ज्यादा टर्न नहीं मिलता।
2016 में जब बीसीसीआई ने दलीप ट्रोफी में पिंक गेंदों को परखने का प्रयोग किया था, तो नतीजा बहुत ज्यादा उत्साहवर्धक नहीं था। उस गुलाबी गेंद से खेलने वाले भारतीय टीम के एक सदस्य ने टाइम्स ऑफ इंडिया को बताया था, 'बॉल ने बहुत जल्दी अपना रंग खो दिया था। इसे देखना काफी मुश्किल था। खास तौर पर सांझ के समय। साथ ही 20 ओवरों के बाद स्पिनर्स के लिए यह काफी सॉफ्ट हो गई थी। पिच से उछाल हासिल करना भी काफी मुश्किल था।' बल्ले और गेंद के बीच संतुलन गुलाबी गेंद का आकार जल्दी बिगड़ जाता है ऐसे में गेंदबाजों की सहायता के लिए क्यूरेटर्स पिच पर अधिक घास छोड़ने लगे हैं। 2015 में ऐडिलेड में हुए टेस्ट में विकेट पर 11 मिमी घास छोड़ी गई थी ताकि ऑस्ट्रेलिया और न्यू जीलैंड के गेंदबाजों को अधिक माकूल परिस्थितियां मिल सकें। सांझ के समय की चुनौती अभी तक खेले गए सभी 11 डे-नाइट टेस्ट मैचों में एक बात सामने आई है कि दूसरे सेशन के आखिरी 45 मिनटों में गेंदबाजों का सबसे ज्यादा वर्चस्व देखा गया है। सांझ (सूरज डूबने और आर्टिफिशल लाइट के प्रभावी होने) के समय मौसम ठंडा होने के बाद विकेट तेज हो जाती है और साथ ही इस रोशनी में गेंद को पकड़ पाना भी थोड़ा मुश्किल साबित हो रहा है। सर्दियों में गुलाबी गेंद की पहली परीक्षा 22 से 26 नवंबर के बीच ईडन गार्डन पर भारत का पहला डे-नाइट टेस्ट मैच खेला जाएगा। सूरज ढलने के बाद जो पूर्वी भारत में करीब 4:15 के करीब हो जाएगा, सर्दी बढ़ जाती है। ओस पड़ने के बाद गुलाबी गेंद किस तरह व्यवहार करेगी यह सवाल सबके दिल में है। इन्हें गुलाबी गेंद से खेलने का अनुभव चेतेश्वर पुजारा, मयंक अग्रवाल, ऋषब पंत, कुलदीप यादव, मोहम्मद शमी और ऋद्धिमान साहा। आनंद ने कहा कि एसजी ने बीते दो साल में गुलाबी गेंद के व्यवहार पर काफी स्टडी की है और उन्होंने इसे काफी बेहतर बनाया है। उन्होंने कहा, 'घरेलू परिस्थितियों के अनुसार हर ब्रांड की अपनी कुछ मजबूती और कमजोरी होती हैं। हमने गेंद पर कोटिंग और लाह का संतुलन बनाने का प्रयास किया है।' आपको बता दें कि इस साल दलीप ट्रोफी को गुलाबी गेंद से आयोजित नहीं करवाया गया था। समझें क्यों हो रहा डे-नाइट टेस्टटी20 क्रिकेट काफी तेजी से लोकप्रिय हो रहा है। हर देश में टी20 लीग्स की शुरुआत हो रही है। टेस्ट क्रिकेट को बचाए रखने के लिए आईसीसी काफी प्रयास कर रही है। कई टीमों से बात करने के बाद आईसीसी डे-नाइट टेस्ट मैच के आइडिया के साथ सामने आई। यह उन लोगों के लिए फायदेमंद होगा जो रोजमर्रा के काम के बाद टेस्ट क्रिकेट देखना चाहते हैं। कब हुआ था पहला डे-नाइट टेस्ट मैच
  • 27 नवंबर से 1 दिसंबर 2015 के बीच पहला डे-नाइट टेस्ट मैच खेला गया। यह मुकाबला ऐडिलेड ओवल में न्यू जीलैंड और इंग्लैंड के बीच खेला गया था। ऑस्ट्रेलिया ने इस करीबी मुकाबले को तीन विकेट से जीता। यह एक लो-स्कोरिंग मैच था जिसमें तेज गेंदबाजों का दबदबा देखा गया। खास तौर पर सूरज ढलने के बाद पेसर्स को काफी मदद मिली लेकिन तीन दिन तक चले इस टेस्ट मैच में आए दर्शकों की संख्या को देखकर अंदाजा हुआ कि यह आइडिया काम कर सकता है।
  • भारतीय टीम प्रबंधन अब काफी हद तक अपनी पेस बैटरी पर निर्भर है। यहां तक कि भारतीय पिचों पर भी यह अटैक काफी अहम भूमिका निभा रहा है और रिवर्स स्विंग तेज गेंदबाजों के लिए एक अहम हथियार है। यहां तक कि ईडन गार्डन की पिच पर भी सामान्य से अधिक घास छोड़ी जाएगी और साथ ही शाम को ओस के चलते स्पिनर्स के लिए भी गेंदबाजी करना मुश्किल हो जाएगा।
  • बीसीसीआई को अगले सप्ताह तक एसजी की ओर से गेंदें मिलने की उम्मीद है। इसके बाद बोर्ड टेस्ट विशेषज्ञों- जैसे मोहम्मद शमी, उमेश यादव, ईशांत शर्मा और चेतेश्वर पुजारा- आदि को तैयारी के लिए पर्याप्त समय दे पाएगा। संयोग की बात है कि भारतीय टीम ने पिछले साल लाल गेंद की क्वॉलिटी को लेकर भी सवाल उठाया था। हालांकि आनंद का मानना है कि कंपनी ने वह समस्या सुलझा ली है। उन्होंने कहा, 'हमनें गेंद को अधिक कड़क बनाया है और भारतीय टीम ने अब सकारात्मक फीडबैक दिया है। हमने पिंक बॉल में भी वही कड़कपन दोहराने की कोशिश की है।'
नंबर्स गेम
  • 11 डे-नाइट टेस्ट मैच खेले गए हैं अभी तक। सभी मैचों के नतीजे निकले हैं।
  • 3 मैच खेले गए हैं ऐडिलेड ओवल पर। सबसे ज्यादा डे-नाइट टेस्ट इसी मैदान पर हुए हैं।
  • 16 शेड्स (गुलाबी रंग) आजमाए गए फाइनल कलर तक पहुंचने से पहले


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