सिडनी कौन कहता है ड्रॉ नीरस होता है? कौन कहता है कि टेस्ट मैच में रोमांच नहीं होता? सिडनी में जो हुआ उसे टेस्ट क्रिकेट का रोमांच कहते हैं। इसमें इंद्रधनुष के सभी रंग नजर आए। अगर आप असली क्रिकेट फैन हैं तो रविवार को भारत और ऑस्ट्रेलिया के मुकाबले ने आपका दिन बना दिया। बेशक अगर आप ऑस्ट्रेलिया के फैन हैं जो जाहिर तौर पर आप निराश होंगे। आपकी टीम जीत जो नहीं सकी। पर, यहां एक कई बार दोहराई गई बात कही जा सकती है- 'असल जीत क्रिकेट की हुई।' भारत को जीत के लिए 407 रन बनाने थे, टीम ने बनाए पांच विकेट पर 334। मुकाबला बराबरी पर छूटा लेकिन ओवर-दर-ओवर और फिर गेंद-दर-गेंद रोमांच बढ़ता गया। बढ़ता गया नशा टेस्ट क्रिकेट एक ऐसा नशा जो सेशन-दर-सेशन चढ़ता है। सुरूर की तरह। यहां नजर आती है खेल की असली खूबसूरती। गेंद और बल्ले के बीच असली जंग। कई बार हार-जीत से परे। बॉर्डर-गावसकर सीरीज के तीसरे टेस्ट मैच में यही देखने को मिला। मैच भारत के हाथ से जा रहा था। फिर ऋषभ पंत का बल्ला चला और चेतेश्वर पुजारा का साथ मिला। पलड़ा भारत की ओर झुका। पंत ने 118 गेंद पर ताबड़तोड़ 93 रन बनाकर ऑस्ट्रेलिया को बैकफुट पर धकेला। दूसरे छोर पर पुजारा किसी संत की तरह खेलते रहे। पंत के प्रभाव से लगभग अछूते। वह जानते हैं अपनी ताकत और उसके इस्तेमाल की कला। रक्षात्मक खेल उनकी हथियार है। और इसी हथियार से वह कंगारू टीम को पस्त कर रहे थे। पहली पारी में पुजारा के जिस रवैये की आलोचना हो रही थी दूसरी पारी में टीम की जरूरत बन गया। बस टिके रहो। गेंद को विकेट से महरूम रखो। पुजारा ऐसा करते रहे। लगातार। बार-बार। इसके बाद कंगारू गेंदबाजों ने दम दिखाया। नाथन लायन ने पंत और जोश हेजलवुड ने टिककर खेल रहे पुजारा को आउट किया। पंत बड़ा शॉट खेलना चाहते थे लेकिन गेंद बल्ले से लगकर फील्डर के हाथ में गई। दूसरी ओर, पुजारा 205 गेंद पर 77 रन बनाकर आउट हुए। हेजलवुड की गेंद बल्ले को छकाती हुई विकेटों से जा लगी। लगा पुजारा के साथ भारतीय फैंस की उम्मीदें भी लौट रही थीं। ऑस्ट्रेलिया को दरवाजा मिल गया। लेकिन वह रास्ता नहीं बना सका। यहां से हनुमा विहारी और रविचंद्रन अश्विन ने मोर्चा संभाला। और तब तक डटे रहे जब तक एक ओवर पहले कंगारू टीम ने हाथ मिलाकर यह मान लिया कि अब जीत मुमकिन नहीं। वक्त ही पूंजी है क्रिकेट में एक विकेट गिरने के बाद कई बार झड़ी लग जाती है। यहां ऐसा नहीं हुआ। हनुमा विहारी चोट के बावजूद लगे रहे। रन नहीं ले रहे थे। बस खेल रहे थे। हर बार गेंद जब उनके बल्ले के बीच से लगती तो कंगारू टीम की कसक बढ़ती जाती। और अश्विन, जो रात तक झुककर जूते के फीते नहीं बांध पा रहे थे, यहां गजब का फुटवर्क दिखा रहे थे। पूरी गेंद पर पूरा पैर निकालकर झुककर गेंद को बल्ले के बीच से आंखों के नीचे खेलते हुए। गेंद छोटी होती तो पीछे जाकर उसे खेलने की कोशिश। कई बार गेंद उन्हें मारी जा रही थी। छोटी, तेज और शरीर को निशाना बनाती हुई। गेंद उन्हें लगती। वह कराहते। लेकिन हार नहीं मानते। अश्विन ने नाम टेस्ट में चार सेंचुरी हैं। लेकिन यहां रन नहीं उतने मायने नहीं रखते थे। रखता था तो वक्त। वक्त जिसे पूंजी कहा जाता है। यहां जो ज्यादा वक्त बचाता, वह मैच को अपनी ओर ले जाता। डटे रहो, वक्त तुम्हारा होगा टेस्ट क्रिकेट के परिणाम के तराजू में हार-जीत के इतर एक और हिस्सा होता है। वह है ड्रॉ का। न तुम हारे, न हम जीते। यानी पलड़ा बराबर। और टीम इंडिया ने जिस तरह इस तराजू को बैलंस किया वह बाकमाल रहा। हनुमा विहारी और रविचंद्रन अश्विन ने कदम यूं जमाए कि जोश हेजलवुड, मिशेल स्टार्क, पैट कमिंस और नाथन लायन से सजा गेंदबाजी आक्रमण विकेटों के तरसता नजर आया। दोनों ने 62 रन जोड़े लेकिन इससे भी अधिक अहम था 259 गेदों तक ऑस्ट्रेलिया को विकेट से महरूम रखना। इस बीच किस्मत का साथ मिला। लेकिन कहते हैं- हिम्मत-ए-मर्दा-मदद-ए-खुदा। टेस्ट क्रिकेट को चार दिन का करने की वकालत करने वालों के लिए यह एक और उदाहरण है। यह प्रशासकों को भी संकेत है कि टेस्ट क्रिकेट कहीं जाने वाला। 2019 की एशेज में स्टीव स्मिथ का बल्ला हो या फिर लंबे समय तक याद रखा जाने वाली बेन स्टोक्स की पारी। और कुसल परेरा की 153 रन की वह पारी जिसने श्रीलंका को साउथ अफ्रीका पर जीत दिलाई थी। टेस्ट क्रिकेट में परिणाम के लिए आखिरी दिन तक जाना पड़ा। आखिरी ओवर तक। 19 साल में पहली बार भारतीय टीम ने मैच की चौथी पारी में 131 ओवर बल्लेबाजी की। 19 साल में पहली बार चौथी पारी में भारत ने 100 से ज्यादा ओवर खेले। साल 2002 के बाद पहली बार टीम ने ऐसा काम किया। इसी से अंदाजा लगाइए कि चौथी पारी में बल्लेबाजी कितनी मुश्किल होती है। पिच गेंदबाजों के अनुरूप होती है। किस वक्त कौन सी गेंद कहां टप्पा लगकर कहां जाएगी कुछ तय नहीं। न उछाल का पता या टर्न का। कोई छाती तक उठ जाएगी तो कोई घुटने से भी नीचे। बल्लेबाज किस धातु का बना है इसकी परख हो जाती है। तकनीक का असली टेस्ट। और सिर्फ तकनीक ही नहीं, मानसिक क्षमता, दक्षता और जुझारूपन की असली परख। और इस टीम ने वह दिखाया। यह टीम इंडिया है यह नए इंडिया की टीम है। नई टीम। व्यक्तिगत खिलाड़ी नहीं टीम के तौर पर खेलती है। विराट कोहली के घर लौटने के बाद कोई टीम इंडिया को चांस नहीं दे रहा था। लेकिन ऐडिलेड में 36 रन पर सिमटने वाली टीम ने मेलबर्न में दमदार वापसी की। लोगों की राय बदलने लगी। टीम की वापसी को सराहा गया। लेकिन सिडनी की जीत उन्हें और करारा जवाब देगी। मुकाबला हारकर अगले मुकाबले में वापसी करना बड़ी बात है लेकिन उससे भी बड़ी बात है हारे हुए मुकाबले को बचाना। इससे पहता चलता है कि मनोवैज्ञानिक रूप से टीम कितनी मजबूत है। ऑस्ट्रेलिया के पास थी बढ़त सिडनी में पहली पारी में 94 रन की बढ़त थी ऑस्ट्रेलिया के पास। ऐसा लगा कि ऑस्ट्रेलिया चार सेशन में भारत को आसानी से निपटा देगा। 407 रन का लक्ष्य। रिकी पॉन्टिंग कह रहे थे कि चौथी पारी में 200 भी नहीं बनेंगे। आधे मुख्य खिलाड़ी साथ नहीं। जो खेल रहे थे उनमें भी चोटिल। और बाकियों को निशाना बनाते कंगारू गेंदबाज। पर टीम डटी रही। कभी-कभी हार को टालना भी जीत से कम नहीं होता। और सिडनी के आसमान पर जब सूरज अस्ताचल में था टीम इंडिया और उसके चाहने वालों का जज्बा और जोश बुलंदियों पर था... अब ब्रिसबन में होगी भिड़ंत अब आखिरी मुकाबला ब्रिसबन का मैदान होगा। भारत ने पिछली बार जब ऑस्ट्रेलिया में टेस्ट सीरीज जीती तब स्टीव स्मिथ और डेविड वॉर्नर नहीं थे। इस बार हैं। उल्टा इस बार हमारे अहम खिलाड़ी नहीं हैं। लेकिन सभी खिलाड़ी 120 प्रतिशत देकर बाकियों की कमी को पूरा कर रहे हैं। तीन टेस्ट के बाद सीरीज 1-1 से बराबर है। ऑस्ट्रेलिया फुल स्ट्रेंथ है और भारत 'जख्मी शेर'। 15 जनवरी से जब एक बार फिर दोनों टीमें आमने-सामने होंगी तो टीम इंडिया के पास मोमेंटम होगा और ऑस्ट्रेलिया के पास खुद को साबित करने का दबाव। और वहां जो बाजी जीतेगा उसे ही मिलेगी बॉर्डर-गावसकर ट्रोफी।
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