नई दिल्ली कानपुर में भारत और न्यूजीलैंड के बीच टेस्ट मैच ड्रॉ रहा। भारतीय टीम जीत के मुहाने पर थी लेकिन आखिरी विकेट हासिल नहीं कर पाई। नतीजा एक विकेट बाकी रहते न्यूजीलैंड ने मैच ड्रॉ करवा लिया। न्यूजीलैंड इस मैच को जीत नहीं सकता था। लेकिन उसने भारत को भी जीतने नहीं दिया। कमाल की बात रही कि भारत को जीत से महरूम रखने में दो भारतीयों का ही हाथ रहा। और एजाज पटेल। इसमें से भी रचिन का सबसे ज्यादा। यह खूबसूरती है टेस्ट क्रिकेट की। यहां हार और जीत के इतर भी कुछ होता है। ड्रॉ। यानी न तुम जीते, न हम हारे। यह ड्रॉ हो सकता है कि किसी के लिए हार की तरह हो और किसी के लिए जीत से भी बड़ी। पांच दिन का मुकाबला और आखिरी गेंद तक जूझना। और उसके बाद सब हाथ मिलाकर ड्रॉ। बाएं हाथ के इस स्पिनर ने क्रीज पर खूंटा गाड़ दिया। रविचंद्रन अश्विन और रविंद्र जडेजा की फिरकी कमाल कर रही थी। न्यूजीलैंड के एक के बाद एक बल्लेबाज पविलियन लौट रहे थे। भारत की वक्त के साथ दौड़ लगी थी। सूरज की आंख-मिचौली के बीच विकेट लेने का सिलसिला जारी था। लेकिन... यह बहुत बड़ा शब्द है। कहते हैं न- मैच आखिरी गेंद तक खत्म नहीं होता। वही हुआ। आखिरी गेंद तक भारत को उम्मीद थी। लेकिन जैसे ही रविंद्र जडेजा की गेंद को ने डिफेंस किया, भारत की उम्मीदें खत्म हो गईं। मैच जो उसकी झोली में था, उसे दो भारतीयों ने उससे दूर कर दिया। रचिन- यह नाम राहुल द्रविड़ और सचिन तेंडुलकर का मेल है। क्रिकेट के दीवाने पिता ने राहुल द्रविड़ और सचिन तेंडुलकर के नाम को मिलाकर बेटे को नाम दिया। बेटे पर दारोमदार बड़ा था। कानपुर में टेस्ट करियर का आगाज करने का मौका मिला। वह भी भारत के खिलाफ। लेकिन इस खिलाड़ी ने दिखाया कि उनमें न सिर्फ तकनीक है बल्कि मानसिक रूप से भी वह काफी मजबूत हैं। उन्होंने एक छोर संभाल लिया। उन्होंने 91 गेंदों का सामना किया। भारत में टेस्ट मैच के आखिरी दिन किसी निचले क्रम के बल्लेबाज का इतनी गेंद खेलना अपने आप में बहुत बड़ी बात है। अश्विन और जडेजा की घूमती गेंदों के सामने कीवी टेलऐंडर परेशान थे लेकिन रविंद्र नहीं। उन्होंने बल्ले और पैड को साथ रखा। कोई गेंद दूर से नहीं खेली। पर स्पिन खेलने की यह तकनीक यूं ही नहीं आई। वीवीएस लक्ष्मण ने मैच के बाद बताया कि रचिन के पिता, जो बेंगलुरु से हैं, हर साल अपने बेटे को लेकर बैंगलोर आते थे। साल 2011 से वह लगातार भारत आकर स्पिन बोलिंग खेलने की प्रैक्टिस किया करते थे। यानी यह पारी 10 साल की मेहनत का हिस्सा है। मैच के बाद रविचंद्रन अश्विन ने भी कहा कि आजकल निचले क्रम के बल्लेबाजों को आउट करना इतना आसान नहीं होता। वह काफी अच्छी तरह तैयारी करके आते हैं। रविंद्र को पटेल का साथ मिला। दोनों ने 52 गेंदें खेलीं। हर गेंद पर भारतीय दल और फैंस उम्मीद रखता। हर गेंद पर जीत की उम्मीद आती। लेकिन हर बार रचिन और एजाज का बल्ला उसे तोड़ देता।
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