Tuesday, February 18, 2020

कंधे पर सचिन, 'खेल की दुनिया का सबसे यादगार लम्हा'

बर्लिन अप्रैल 2, 2011, मुंबई का वानखेड़े मैदान. भारतीय टीम ने 28 साल बाद क्रिकेट वर्ल्ड कप जीता। मैच के बाद टीम इंडिया के खिलाड़ियों ने सचिन तेंडुलकर को कंधे पर बैठाकर मैदान के चक्कर लगाए। यह तस्वीर क्रिकेट प्रेमियों के जेहन में आज भी ताजा है। टीम इंडिया की जीत के बाद जश्न के इस पल को दुनिया का सबसे यादगार लम्हा चुना गया। यह ऐसा यादगार लम्हा था, जिसने भी इसे देखा वह उसके लिए इसे भुला पाना आसान नहीं होगा। सोमवार को सचिन तेंडुलकर को उनके साथी खिलाड़ियों द्वारा कंधे पर उठाने की तस्वीर को दो दशक का लॉरेस स्पोर्टिंग मोमेंट चुना गया। सचिन ने न तो फाइनल में विजयी रन बनाया था, न ही कोई विकेट लिया था और न ही कोई शानदार कैच लपका था। एक लिहाज से देखा जाए तो वर्ल्ड कप फाइनल में उनका योगदान बहुत शानदार नहीं था लेकिन तेंडुलकर स्टार ऑफ द शो थे। जब विराट कोहली और टीम के अन्य सदस्यों ने उन्हें कंधे पर बैठाकर मैदान के चक्कर लगाए थे। इस तस्वीर का टाइटल 'कैरिड ऑन द शोल्डर्स ऑफ ए नेशन' एक देश ने कांधे पर बैठाया। इसी तस्वीर को दुनियाभर में हुए वोटों की गिनती के आधार पर विजेता चुना गया। सचिन इस लॉरेस खिताब को जीतने वाले पहले भारतीय भी बने। खेलों की दुनिया में इसे सर्वश्रेष्ठ अवॉर्ड माना जाता है। सचिन को यह खिताब दो महान खिलाड़ियों- ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान स्टीव वॉ और टेनिस दिग्गज बोरिस बेकर- के हाथों यह सम्मान दिया गया। अपने भावनात्मक भाषण में सचिन ने कहा, 'विश्व कप जीतने के अहसास को लफ्जों में बयां नहीं किया जा सकता... बहुत कम ऐसा होता है कि पूरा देश एक साथ जश्न मनाए। विश्व कप जीत कुछ ऐसा ही था। यह आपको याद दिलाता है कि खेल में कितनी ताकत होती है और यह हमारे जीवन में किस हद तक जादू का काम करता है। मैं आज भी उस लम्हे को देखता हूं तो मेरे रौंगटे खड़े हो जाते हैं। यह लम्हा हमेशा मेरे साथ रहेगा।' सचिन तेंडुलकर ने अपना पहला विश्व कप 1983 में खेला। अपने छठे प्रयास में उन्होंने विश्व कप जीता। बोरिस बेकर ने उनसे पूछा कि आखिर उस सपने को हासिल कर उन्हें कैसा लगा जिसका पीछा उन्होंने इतने लंबे समय तक किया। तेंडुलकर ने कहा, 'मैं 1983 में 10 साल का था जब मेरे सफर की शुरुआत हुई। भारत ने पहली बार विश्व कप जीता था। उस समय मुझे अहसास नहीं हुआ कि यह कितना बड़ा लम्हा है, सिर्फ इसलिए कि हर कोई खुशी मना रहा था, मैं भी उनके साथ जुड़ गया। लेकिन कहीं न कहीं मैं जानता था कि देश के लिए कुछ बड़ा हुआ है और मैं भी उसका हिस्सा बनना चाहता था। इस तरह मेरे सफर की शुरुआत हुई। जब 2011 वर्ल्ड कप की ट्रोफी मेरे हाथ में थी और साथ में तिरंगा, यह मेरे जीवन का सबसे गौरवांवित करने वाला लम्हा था। उस ट्रोफी को अपने हाथ में थामना जिसका पीछा मैं 22 साल से कर रहा था। लेकिन मैंने कभी उम्मीद नहीं छोड़ी, कभी हार नहीं मानी। मैं ट्रोफी अपने देशवासियों की ओर से थाम रहा था।' सचिन ने नेल्सन मंडेला के प्रभाव के बारे में भी बात की। तेंडुलकर 19 साल के थे जब उन्होंने साउथ अफ्रीका दौरे पर मंडेला से मुलाकात की थी। सचिन ने कहा, 'उन पर (नेल्सन मंडेला) पर आईं मुश्किलों ने कभी उनकी लीडरशिप को प्रभावित नहीं किया। उनके कई संदेशों में मेरी नजर में सबसे प्रभावशाली- खेल में सभी को जोड़ने की शक्ति है- था।' उन्होंने आगे कहा, 'आज इस कमरे में कई बड़े ऐथलीट के साथ बैठा हूं। कुछ के पास सब कुछ नहीं था लेकिन उन्होंने अपनी प्रतिभा का भरपूर इस्तेमाल कर सब कुछ हासिल किया। मैं उन्हें युवाओं को खेल को चुनने और अपने सपनों का पीछा करने के लिए प्रेरित करने के लिए धन्यवाद देता हूं। यह ट्रोफी सभी युवाओं को समर्पित है, यह सिर्फ मेरे लिए नहीं है।'


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